रूस की आधी ताक़त अपनी भौगोलिक कठिनाइयों से निबटने में चली जा रही है, विज्ञान उन्नत है लेकिन बहुत सारी ज़रूरी चीज़ों के लिए उसे अपने विज्ञान को मूल तौर पर युद्ध के हथियार के रूप में बेचना पड़ रहा है। दूसरी और अमेरिका है जो अपने नागरिकों को सर्वोत्तम जीवन (जिसकी परिभाषा उसे शायद पता है ही नहीं) देने के चक्कर में पूरी निष्ठा से देशों को लड़वा कर युद्ध के हथियार भी बेच रहा है और बाद में दवाईयाँ भी बेच रहा है। दोनों ताक़तवर देश और उसके सहयोगी देश धन के पीछे पड़े हैं और मोहरे बन रहे हैं तीसरी और चौथी दुनिया के राष्ट्र जिनको कई बार ये पता भी नहीं होता की वो हथियार ख़रीद क्यों रहे हैं। इसलिए अपने मकसद के लिए उन दोनों महाशक्तियों ने ऐसे लोगों को चुना है जिनका कबीलाई इतिहास है और क्रूरता कुछ प्राकृतिक और भौगोलिक कारणों से उनके समाज में स्वीकार्य है। गर्दन काटने वाले इन्सान से ज़्यादा ख़तरनाक वो इन्सान होता है जो पहले आपकी मदद करता है और एवज में आजीवन आपको अपनी गर्दन उनके क़दमों में झुकाये रखने को कहता है।
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